Wednesday, October 4, 2017

पिता का फोन

मेरे पिता के पास था
ड्यूल सिम एंड्राइड मोबाइल
नई तकनीकी से नही था
उन्हें किसी किस्म कोई डर
अलबत्ता,वो नई चीजों को सीखने के लिए
रहते थे हमेशा उत्साहित और तत्पर
स्क्रीन टच फोन को प्रयोग करना सीखा था
उन्होंने बेहद तेज गति से
यदि अब वो होते तो
निसंदेह व्हाटस एप्प पर होते
मेरे से अधिक सक्रिय

उनके मरने पर मैं इस कदर डर गया
दाह संस्कार के बाद तुरन्त निकाले
दोनों सिम उनके मोबाइल से
मुझे लगा यदि कोई उनका परिचित करेगा फोन
कैसे बताऊंगा मैं हर बार एक ही बात
अब नही रहे पिताजी
अब बचा है केवल उनका सेलफोन

पिताजी की अंग्रेजी थी कामचलाऊ
उनकी फोनबुक की थी अपनी एक
मौलिक भाषा
भले ऐसी भाषा पर नही करेगा कभी
कोई भाषावैज्ञानिक शोध
मगर उन्हें रहते थे याद सब नाम
अपनी कूटभाषा मे
किसी कुशल गुप्तचर की तरह

पिता के मरने पर
मर गया उनके संपर्कों का
एक जीवंत संचार-संसार
शेष बचे रह गए
कंपनियों के प्रमोशनल एसएमएस
और उनकी पसंदीदा गानों का
एक अदद माइक्रो एसडी कार्ड
जो आज भी किसी दैवीय यंत्र की तरह
पड़ा है मेरे पर्स में

उनके मरने पर
उनके फोन ने घोषित किया होगा
मुझे बेहद मतलबी पुत्र
उनका फोन बंटा हमारे मध्य
किसी पैतृक सम्पत्ति की तरह
मगर एकदिन वो भी
पिता की तरह हो गया मृत
मशीन की यह अभी तक ज्ञात
सबसे श्रेष्ठ स्वामी भक्ति लगी मुझे

पिता का फोन बंद करने की
मेरी सारी वजह मनोवैज्ञानिक थी
पिता बन गए थे भूत
और
मैं भाग रहा था पिता के अतीत से
मेरा वर्तमान और भविष्य
हंसते थे एक क्रूर हंसी
पिता के संपर्कों दुनिया
पिता के जाने के बाद
मेरे लिए हो गई थी अर्थहीन

पिता का फोन बंद करने पर
एक नीरव शांति थी
एक घोषित निर्वात था
पिता का पलायन
कटु यथार्थ के रूप में हुआ घटित जीवन मे

पिता के फोन बंद करने पर
नही जताया किसी ने कोई ऐतराज़
चिता की तरह धीरे धीरे जलकर
समाप्त हो गई थी
लोक में उनकी स्मृतियां

पिता का फोन बंद करने की
सबसे त्रासद स्मृति यह है मेरे पास
उनके सगे मामा ने कहा
तुम्हें नही करना चाहिए था उसका फोन बंद
इससे पता चलता तुम्हें
तुम्हारे पिता पर था
किस-किस का कर्जा शेष

इस सुझाव को
व्यवहारिक समझा जा सकता था
मगर बतौर पुत्र मुझे यह लगा था
बेहद खराब
मरे हुए आदमी की सब चीजें छूट जाती है
कर्जा करता है मरने के बाद भी पीछा
और फोन बनता है इसका जरिया
ये बात लगती होगी
मरे हुए आदमी के जिंदा फोन को भी खराब

पिता के मरने पर
उनकी सामाजिक स्मृति का
एक मात्र साधन बचा था कर्जा
रिश्तेदारों के आत्मीय लोक में
उनके देह और कर्म
पा गए थे तत्काल मोक्ष
अस्थि कलश से भी
छोटी हो गई थी उनकी दुनिया

मुद्रा का यह सबसे क्रूरतम रूप लगा मुझे
जो मरे हुए आदमी को भी
करता था जिंदा रखने की
एक औपचारिक जिद

पिता का फोन देख
आज भी याद आती है कि
उनकी प्रिय रिंगटोन
वो यदा-कदा सपनों में आते है नजर
आज तक नही पूछा उन्होंने कभी
अपने प्रिय फोन के बारे में

न ही पूछे तो बेहतर है
क्योंकि उनकी तरह अब
फोन भी है मृत
दोनों आपस मे कर सकते है
बेहतर बातचीत

मैं केवल देख सकता हूँ
पिता का मोबाइल
पिता का दीवार पर टँगा चित्र
लिख सकता हूँ एक लंबी कविता
स्मृतियों का सहारा लेकर
कर सकता हूँ एकतरफा सम्वाद
पिता और उनका फोन
शायद इस बिनाह पर कर दें
मुझे माफ
मेरा बस इतना अधिकतम स्वार्थ है।

©डॉ. अजित

Monday, October 2, 2017

संतोष

मैनें विपत्ति में
कभी याद नही किया तुम्हें
ना तुम्हें बनाया
अपने विकट एकांत का साथी

इन दोनों के लिए
मैं अकेला ही पर्याप्त था

दुःखों पर तुमसें बात की हो
ऐसा भी नही आता याद

दरअसल, दुःख इतने निजी थे मेरे
उन्हें हर हाल में बचाना था मुझे
प्रेम की छांव से
यदि ऐसा न करता मैं
वो सूख नही पाते असुविधाओं की धूप में

तुम्हें मैं हाथ पकड़ ले गया उस जगह
जहां न एकांत था न दुःख और न कोई विपत्ति

मैंने जोखिम लिया
बात न करने का इन विषयों पर
मेरे पास दूसरे विषय कम थे
मगर मैं बातचीत को हमेशा मोड़ता रहा
भीड़,सुख,योजना और महत्वकांक्षा की तरफ

प्रेम की कल्पना में
यही सहारा था मेरे पास
और इतनी ही थी मेरी बातचीत में गुणवत्ता कि

मैं जितना कह पाया
उससे कई गुना ले गया बचाकर
अपने साथ

इसलिए
नही मिलेगा मेरी बातों से तुम्हें कोई अनुमान
मैं कब खुश था और कब नाखुश

तुम्हें मिलेगी मेरी बातों में एक पुनरावृत्ति
जैसे मैं अटक गया हूँ
एक खास मनःस्थिति में

मेरा मिलना इसलिए संदिग्ध है
मेरा कोई पता नही मिलता आपस में
मेरी बातों को जोड़कर नही बनता एक सारांश

हम दोनों की आश्वस्ति की
एकमात्र बड़ी वजह यही है
जिसे समझा गया है
प्रेम का आत्मिक सन्तोष।

©डॉ. अजित

Monday, September 18, 2017

‘ताकि सनद रहे’

मैं अपनी स्मृतियों से चूका हुआ और
उत्तम और मध्यम के बीच अटका
एक पुरुष हूँ
मेरी पूर्व प्रेमिका ने मुझे
सदा सुखी रहने का आशीर्वाद दिया था
और वर्तमान प्रेमिका ने शाप दिया है
कि मैं सदा भीड़ से घिरा रहा हूँ

मैं अकलेपन की तलाश में हूँ
मगर मेरी तलाश में
कुछ वक्त की शिकायतें है

प्रेमिका समेत हर रिश्तें का प्रेम
नही बचा सकता फिलहाल
मुझे चोटिल होने से

मेरे घाव इतने गुम किस्म के है
उन्हें देख याद आता है शरीर सौष्ठव

मैं किसी किस्म की उपचार की उम्मीद में  नही हूँ
क्योंकि मैं जानता हूँ
उपचार बीमारी का हो सकता है
बीमार का नही

मेरी बातों की ध्वनि से नकार की गंध आती है
मगर ये मेरे जीवन चरम आशावाद है
कि मैं हर हाथ को चूमना चाहता हूँ
मगर जैसे ही बढ़ता  हूँ आगे
मेरी स्मृतियाँ दे जाती दगा
और मैं चूम लेता हूँ खुद ही का हाथ

मेरा स्वाद हो गया है बेहद एकनिष्ठ
मेरे होंठ नही पहचानते है
मेरी खुद की जीभ को

मैं जैसे ही गुनगुनाता हूँ कोई गाना
तो भूल जाता हूँ अंतरे और मुखड़े का भेद
इस पर गाना नही बदलता मैं
बस गाना चबाने लगता हूँ
इस शाब्दिक हिंसा के लिए
गीतकार मुझे नही करेगा कभी माफ़

दरअसल, ये जो ‘मैं’ –‘मैं’ लिखकर
बकरा बन रहा हूँ मैं
ये भी मेरी स्मृतियों के चूकने का परिणाम ही है

मनुष्य और बकरे के भेद में
ढह गया है मेरा बचा-खुचा पुरुषार्थ

मुझे जो भी कुछ याद है
वो सफाई का एक बुद्धिवादी संस्करण है
मैं जो कुछ भूल गया हूँ
वो मेरा निजी व्याकरण था

मेरे पास फिलहाल है
लिपि का अन्धकार
और शब्दों का  रौशनदान

जहां से मैं रोज़ देखता हूँ
अपनी स्मृतियों के उड़ते हुए कबूतर
जिन्हें आप समझ सकते है
मेरी आत्मिक शान्ति का प्रतीक

ऐसा ना भी समझे तो भी नही पड़ेगा
मुझे कोई ख़ास फर्क

मेरी स्मृतियों ने मुझे बना दिया
इतना मजबूत और कमजोर एक साथ
कि अब मैं हंस सकता हूँ
छोटे अपमान पर
मैं रो सकता हूँ किसी बड़े  सम्मान पर

स्मृतियों से चूकने का
मेरे पास यही सबसे लौकिक प्रमाण है
जिसे कविता की शक्ल में
लिख दिया है इसलिए
‘ताकि सनद रहे’

©डॉ. अजित




Sunday, September 17, 2017

उसकी बातें

कुछ तारीफें झूठी तो
कुछ सच्ची थी
जो भी थी मगर अच्छी थी

उसकी बातों में
हंसी पिंघलती थी
वो सपनों में अक्सर
आंख खोलकर चलती थी

उसकी हंसी एक पहाड़ी झरना था
जिसके शोर हो सुन-सुन कर
हर पुराना जख्म मेरा भरना था

उसके पास नही कोई शिकायत थी
उसकी खुशबू जैसे कुरान की आयत थी

वो कहती हमेशा खुश रहना
मैं पूछता कैसे
तो कहती देखना शाम को नदी का बहना

फिर यूं हुआ वो खो गई
हमारी कुछ बातें दिन में सो गई

ख्वाब हो या हकीकत
दोनों में उसका किस्सा है
जो साथ जिया था हमने कभी
वो ज़िन्दगी का बेहतरीन हिस्सा है।

©डॉ. अजित

Tuesday, September 12, 2017

असुविधा

पिता को याद करने के लिए
पुराणों का सन्दर्भ लेना होगा
ये कल्पनातीत बात थी
मेरे लिए

पिता आकाश की तरह थे
उनके रहते बादल भी
बचा लेते थे धूप से
उनकी अनुपस्थिति में
धूप ने घेरा हर तरफ से मुझे

अब एक दिन
सूरज से करता हूँ निवेदन
भेजता हूँ उनकी रुचि का भोजन
तो धूप विनम्रता से आती है पेश

तमाम वैज्ञानिक चेतना के बावजूद
करता हूँ उम्मीद उनकी तृप्ति की

जब करता हूँ याद अपनी बदतमीजियां
तो हाथ कांपने लगते है मेरे
छूट जाता है अन्न और जल भूमि पर
और हड़बड़ा कर बैठ जाता हूँ मैं
एक अंधेरे कमरे में

पिता मुझे तलाश लेते होंगे
किसी भी अंधकार में
ये सोचकर मैं
नही करता रौशनी का इंतजार

पिता का खो जाना
खुद का खो जाना जैसा है
पिता नही बस उनकी
स्मृतियां मिलती है मुझसे
और करती है बड़े अजीब सवाल

कुछ सवालों के जवाब
मैं केवल पिता को देना चाहता हूँ
उनके अलावा नही हूँ
किसी के प्रति मैं जवाबदेह

इसलिए जवाबों के बोझ तले दबा
करता रहता हूँ याद उन्हें
पूरी शिद्दत के साथ

पिता मुझे कभी मजबूर
नही देखना चाहते थे
मगर मैं उन्हें दिखा पाया अपना
मात्र यही एक रूप

मैं पिता को कमजोर नही
देखना चाहता था
मगर वो अक्सर पड़ते गए कमजोर

असल जिंदगी
बड़ी अस्त व्यस्त थी हमारी
इतनी अस्त व्यस्त कि
पिता एकदिन निकल गए बहुत दूर

और मैं अपनी ज़िंदगी की
सबसे अच्छी खबर के इंतजार में रह गया
पिता मुझे देख सकते है
ये उनके लिए बड़ी सुविधा है

मैं पिता को नही देख सकता
ये मेरे जीवन की स्थायी असुविधा है।

©डॉ. अजित
(पिता के श्राद्ध पर)

बदलना

तुम बदल गई !
ये एक बेहद लोकप्रिय कथन होगा
इसके माध्यम से नही हो पाएगी
सम्प्रेषित मेरी कोई निजी बात
मैं हर उस बात से बचना चाहता हूँ
जो पहले कई कई बार कही का चुकी

जो बन गई हो एक जुमला
और खो गई हो अपना अर्थ

तुम बदल गई
तुम बेवफा हो
मुझे सख्त नफरत है
इन दोनों कथनों से

ना तुम बदली हो
ना तुम बेवफा हो

बावजूद इसके तुम क्या हो गई हो
बताने के लिए नही है मेरे पास शब्द
मैं अंदर से इस कदर रीत गया हूँ
कि मेरी आह लौट आती है
अंदर से ही अंदर की तरफ

तुम अब चित्र में नही हो
मगर मैं एक मानचित्र पर भरोसा किए बैठा हूँ
जिसके सहारे हमे मिलना था
कभी समन्दर किनारे
कभी पहाड़ पर
तो कभी निर्जन रेगिस्तान में

मैं कोई वादे याद नही दिला रहा हूँ
मैं बस देख रहा हूँ अवाक
सीमेंट की तरह दीवार का साथ छोड़ना
सीलन की तरह दीवार का साथ निभाना

शायद
मैं ही बदल गया हूँ
तभी तो नही देख पा रहा हूँ
तुम्हें इर्द-गिर्द
यदि मैं नही बदला होता तो
तुम्हें मैं देख लेता
अनुपस्थित में भी उपस्थित

अब जब नही देख पा रहा हूँ
लगता है शायद वक्त बदल गया है
मैं आवाज़ दे रहा हूँ अतीत से
जो सीधी जाती है भविष्य की तरफ

जिसे सुन समझ आ गया है इतना
हमारे मध्य का वर्तमान बदल गया है।

©डॉ. अजित

अस्तपाल की कविताएँ-3

अस्तपाल की कविताएँ-3
__
मैं और तुम
किसी इंश्योरेंस पैनल का हिस्सा नही है
हम बीमारी के खर्चे के मामलें में
थोड़ा  खुद के भरोसे है
थोड़ा दोस्तों के
और अंत में ईश्वर के
पैसे के इंतजाम का दबाव
थोड़ा-थोड़ा सबके भरोसे है
दरअसल भरोसा ही परास्त करेगा  
बीमारी के चक्रव्यूह को
इसलिए मुद्रा से अधिक मुझे
तुम्हारे भरोसे की फ़िक्र है.
***
अस्पताल के लिए हम भरोसेमंद नही है
हर चौबीस घण्टे में वो जमा करवाते है कुछ पैसा
और बताते है मेरा अकाउंट बैलेंस
बीमारी के अलावा एक लड़ाई खुद से भी है
जरूरत और सामार्थ्य का वर्गमूल निकालता हुआ
भूल जाता हूँ मैं तुम्हारी बीमारी और तुम्हें भी
यह एक नई किस्म की बीमारी है
जो लग गई है मुझे अस्पताल आकर.
**
दुनिया में दो किस्म की घड़ियाँ है
एक जो मेरी कलाई पर बंधी है
दूसरी जो अस्पताल की दीवार पर टंगी है
दोनों का समय  अलग-अलग है
मेरी घड़ी तेज चल रही है
अस्पताल की घड़ी की अपनी एक गति है
उसे देख भटक जाता है मेरा कालबोध
अस्पताल की और मेरी घड़ी
उस वक्त बताएगी सही समय
जब नर्सिंग स्टेशन पर सम्यक भाव से
सिस्टर निकालेगी डिस्चार्ज समरी का प्रिंटआउट
जब वो समझा रही होगी मुझे
तुम्हारी दवा लेने का समय
उस वक्त मन ही मन कहूंगा मैं
अब वक्त सही हो गया है.
**
कुलीन किस्म के अस्पतालों में
खाने की चीजें महंगी है
मगर कैंटीन में भीड़ है
दुःख से जूझता आदमी
भूल जाता है महंगाई का बोध
वो किसी भी कीमत पर मुक्ति चाहता है
भूख से भी
बीमारी से भी
अस्पताल की अंदरूनी चमक
चमकती है इसी मुक्ति के भरोसे.
**
जब-जब डॉक्टर सवाल पूछता है तुमसे
मैं चाहता हूँ कि जवाब मैं दूं
तुम्हारी तकलीफ का
तुमसे अधिक अंदाज़ा है मुझे
बस इसलिए रह जाता हूँ चुप
अंदाजा केवल प्रेम में चलता है
विज्ञान में केवल चलता है सच
और तुमसे बेहतर सच बोलना
नही आता मुझे.

© डॉ. अजित



Tuesday, August 22, 2017

व्याकरण

स्त्री में मात्रा बड़ी ई की थी
मगर उन्हें समझा जाता रहा
हमेशा कमजोर और छोटा

बड़ी ई होने के बावजूद
स्त्री की ध्वनि को बनाया गया
स्थायी तौर पर कमजोरी का प्रतीक

व्याकरण के आचार्यों को भी
नही रहा होगा इस बात का अनुमान
कि शब्दानुशासन में भी
पुरुष तलाश लेगा
अह्म और गर्व
सत्ता और अधिकार

स्त्री में भले ही बड़ी ई की मात्रा लगती है
मगर बाद में यह मात्रा भी अर्थ खो बैठी
ई की बड़ी और छोटी मात्रा को बना दिया गया
स्त्रीवाचक संज्ञा का बोझिल सौदंर्य

ध्वनियों में समा गया लिंग का गहरा भेद
शब्दों को यूं कमजोर पड़ते देख
किसी को खराब नही लगा
हो सकता है ना भी गया इस तरफ
किसी का ध्यान

मात्राओं की दुनिया से लेकर
हकीकत की दुनिया में
भांति-भांति के
भेद झेलती स्त्री
नही रच सकी
अपना एक ऐसा व्याकरण

जिसमें उत्तम पुरुष की तरह होती
एक उत्तम स्त्री
और मध्यम पुरुष की होती
एक मध्यम स्त्री।

©डॉ. अजित

Sunday, August 20, 2017

रंग भेद

दवाई के पत्तों पर
बैंगनी स्याही में लिखी है
एक्सपायरी डेट
मैंने इंद्रधनुष में देखता हूँ
बैंगनी रंग
जो नज़र आता है बेहद गाढ़ा

मैं खींच कर कर देना चाहता हूँ इसे अलग
इसलिए पढ़ने लगता हूँ
कोई धार्मिक किताब

दवाई के पत्ते एक दिन
जहर बन जाते है
उस दिन की कोई नही करता प्रतिक्षा

जिंदगी का रंग
इन्द्रधनुष के रंग से मिलता जुलता है
मगर वो बैंगनी नही है
दवाई के पत्ते पर जो बैंगनी स्याही में छपा है
वो एक तारीख है
जिसके इस पार खड़े होकर
प्रार्थना की जा सकती है

यही प्रार्थना काम आएगी
जीवन के दुर्दन क्षणों में
जब रंग छोड़ने लगे हो साथ
दवा और आसमान के रंग से
मिलाकर बनाना होगा
एक वो नया रंग
जिसकी कोई एक्स्पायरी डेट ना हो.

© डॉ. अजित


Saturday, August 19, 2017

बोला चाली वाया कहा सुनी

बोला चाली वाया कहा सुनी
_
पिछली दफा हम इस बात पर लड़ें
कि चाय बनाते वक्त
पत्ती दूध में डालनी चाहिए या पानी में
अंत तक दोनों अपनी बात पर अड़े रहे
यह जानना जरूरी नही कि
किसकी बात सही थी
बल्कि ये बताना जरूरी है
अपनी-अपनी बात सही सिद्ध करने के लिए  
मुद्दत बाद कई चाय साथ पी हमने
और नही पहुंचे किसी निष्कर्ष पर
हमारी ज्यादातर लड़ाईयां
रही  बिना निष्कर्ष के
बस एक  जिंदगी को छोड़कर.
**
उस दिन बेवजह तुनकर
तुमने कहा ‘शट अप’
मगर मैंने सुना ‘ग्रो अप’
इसलिए मैं फिर भी बोलता रहा लगातार
यकीन करना दोस्त !
तुम्हें चिढ़ाने के लिए नही
बल्कि ये समझाने के लिए
तुम्हारे साथ लगातार
बड़ा हो रहा था मैं.
**
तुम इस बात पर खफा थी
मुझे गुस्सा कम आता है
जबकि मैं इसे प्रचारित करता था
अपनी एक खूबी की तरह
और जब-जब मुझे गुस्सा आया
तुम्हें उस पर हंसी आई
इसलिए नही कि वो बचकाना था
बल्कि इसलिए
मुझे गुस्सा ठीक से जताना नही आता था
ये बात मेरे अलावा
केवल तुम जानती थी.
**
तुम खुद को समझते क्या हो?
ये तुम्हारा आम डायलोग था
मैंने हर बार इसका गलत जवाब दिया
थोड़ा फ़िल्मी टाइप का
अगर मैं सही से बता पाता
मैं खुद को क्या समझता हूँ
फिर शायद तुम पूछती
मैं खुद को तुम्हारा क्या समझाता हूँ?
जो तुमने कभी पूछा नही
और मैंने कभी बताया नही.
**
महीने भर ऐसा रहा
हमने एक दूसरे की शक्ल नही देखी
सम्पर्कशून्य होकर जीते रहे
अपनी-अपनी जिंदगी
महीने भर ऐसा भी रहा
हमनें देखा एक दूसरे को
और बदल लिया रास्ता
महीने भर बाद ऐसा हुआ
हम भूल गए महीना
और याद आया वीकेंड
फिर हसंते रहे अपनी बेवकूफ़ियों पर
हमारे साथ हंसता रहा वीकेंड
और रोता रहा बीता महीना.

©  डॉ. अजित 

Thursday, August 17, 2017

भरोसे से चूकना

नदी पर बांध
खेती पर ऋण
मजदूरी पर आधार कार्ड
जरूरी हो गया है

मरने के लिए
कोई बड़ी बीमारी जरूरी नही है अब
आप मर सकते है
कुछ छींक आने भर से

लोग उजड़ जाए
किसान मर जाए
मजदूर परदेस को जाए
अब कुछ फर्क नही पड़ता
किसी को

लड़कियाँ लकड़ी की तरह चूल्हे में लगी है
राख बनने पर उन्ही की राख से
पोता जाएगा चूल्हा

देश अब एक बड़ी कंपनी के माफिक है
सीईओ के भरोसे है अब जनकल्याण
लोकतंत्र का इंक्रीमेंट और इंसेंटिव
भरोसे है अम्बानियों और अडानियो के

विकास देश का बिन ब्याहा लड़का है
जो थोड़ा बिगड़ैल भी है
जिधर को निकलता है
लील जाता है मासूम सपनें

विकास का ब्याह पूंजी से कराने की तैयारी है
देश के बड़े बुजुर्गों और मालिकान को
इससे उसके अंदर
दिख रही सुधार की बड़ी गुंजाईश

बच्चें सांस ले रहे है असामान्य गति से
उनका रक्तचाप छूट गया है
नापने के पैमानों से
हम उन्हें देखकर लगाते है अनुमान
कौन कितनी दूर से दौड़कर आया है

बच्चों को गोद नही शोक नसीब है

और आप पूछते है मुझसे
मैं चुप क्यों बैठा हूँ
कुछ करता क्यों नही

मैं उलटा पूछता हूँ आपसे
क्या देश मुझे वो करने देगा
जो करना चाहता हूँ मैं

मैं चाहता हूँ खाल के नगाड़े बनाना
मैं चाहता हूँ इतना शोर
कि नींद में सोते हुए लोग
बहरें हो जाए सोते हुए ही

मेरी चाहतें अब इतनी वीभत्स है
मैं कर सकता हूँ
किसी दिन अपनी ही हत्या
और रख दूंगा इल्ज़ाम
किसी अपने गहरे दोस्त पर

मैं भरोसे से चूक गया हूँ
देश के अंदर
समाज के अंदर
और खुद के अंदर

इसलिए
मुझसे डरना बेहद जरूरी है
क्योंकि मैं खुद से बहुत डरा हुआ हूँ।

©डॉ.अजित

Wednesday, August 16, 2017

अकेला

कुछ लड़ाईयों को
समाप्त किया जाना चाहिए था
समय रहते
चाहे कितना ही प्रेम क्यों न रहा हो
ऐसी  लड़ाईयां एक दिन लील लेती थी
बचे हुए अधिकार को

एक बादल का अकेला टुकडा
हवा के भरोसे आसमान में रह नही पाता
बादलों की लड़ाई  उसे
कर देती है इस कदर अकेला
वो दौड़ पड़ता है सूरज की तरफ नंगे पैर  

लड़ाई को खत्म करने के लिए
धरती करना चाहती है कोशिश
मगर उसके पैर समंदर में धंसे है

ये बची हुई लड़ाईयां
एकदिन करती है मिलकर शिकार
इनके विजय उत्सव में
भले कोई न होता हो शामिल

ये कर देती है मनुष्य को
इस कदर अकेला
कि वो भूल जाता है
हंसते हुए रोना
और रोते-रोते हंसना.

© डॉ. अजित




शुभकमनाएं

लगातार विजय के कारण
मैं अब  थकने लगा हूँ
अब मैं हारना चाहता हूँ

सहमत लोगो से मैं
उकता गया हूँ
मुझे  स्थायी तौर पर
कुछ असहमत दोस्त चाहिए
जो बता सके मेरे गलती
मेरी आँखों में आँखें डालकर

मैं कुछ दिन भीड़ की बीच रहना चाहता हूँ
जहां कुछ इस तरह का एकांत हो कि
कोई किसी को न जानता हो आपस में

मैं मरने से पहले
जीने का पता चाहता हूँ
ताकि उसके गले मिलकर
कह सकूं धन्यवाद

अब मैं दुखों पर कोई निजी बात
नही करना चाहता हूँ
अब मैं बस इतना चाहता हूँ कि
मैं क्या चाहता हूँ
ये किसी को बताना या समझाना न पड़े

ये थोड़ी मासूम सी चाहत है
इसलिए मैं इसे रखने के लिए
वो दिल तलाश रहा हूँ
जो न भरा हो और ना खाली ही हो
हो सके तो
वापसी की उम्मीद के बिना
फ़िलहाल
सच्ची शुभकमनाएं दीजिए मुझे.

© डॉ. अजित