Tuesday, August 25, 2015

लोकप्रियता

फिर भी
जितनी लोकप्रियता होनी चाहिए थी
उतनी नही थी मेरे पास
यह मेरे जीवन का स्थाई खेद था

मेरे पास एक कच्चा शिल्प था
जो पढ़ने में आसान था
समझने में तो और भी आसान

मेरी बातें रोजमर्रा की बतकही थी
उनमें शास्त्रीयता का था नितांत ही अभाव
दर्शन की जटिलता नही थी उनमें
मन का बिखरा हुआ मनोविज्ञान कहता था मैं

अधूरापन स्थाई भाव था
जो आकर बैठ गया था
मेरी कलम की पीठ पर

कुछ दोस्तों का मत था
एक ख़ास जगह जाकर
थोड़ा अटक थोड़ा भटक गया हूँ मैं

पुनरावृत्ति की शिकार थी मेरी सम्वेदनाएं

मैं किस लिए कहां था
नही बता सकता था किसी साक्षात्कार में

अरुचि और एकालाप के मध्य खींच कर वृत्त
डमरू बजाता था मैं
मेरी कविता इतनी निजी किस्म की थी
कुछ ही लोग 'मैं' को तोड़ जी पाते थे उसका दशमांश

मैं लिख रहा था भूत
वर्तमान की शक्ल में
मैं जी रहा था भविष्य
अतीत की दहलीज़ में
मेरी कोशिसें थी बेहद अस्त व्यस्त और अनियोजित

शायद, तभी संदिग्ध थी मेरी लोकप्रियता।

© डॉ.अजित



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