Wednesday, April 26, 2017

एकदिन

सबकुछ ठीक चल रहा था हमारे बीच
दिन भी सात ही होते थे
और महीना भी तीस ही दिन का था
हर तिमाही पर मौसम बदलता था
और छटे छमाही याद की जाती थी
पुरानी प्यारी बातें

फिर अचानक एकदिन
बदल गया काल चक्र
आंधी में उड़ गया हमारा निजी पंचांग
अब सप्ताह होता था दो दिन का
दुनिया जिसे वीकेंड समझ
जश्न की तैयारी में मशगूल होती
उन दो दिनों में भटकता था मैं बेहताशा
महीना अब कोई एक पूरा नही होता था
जेठ में बैसाख और चैत में आषाढ़ के बादल दिखने लगते थे आसमान पर

मौसम अब एक जैसा रहता था
मैं उसके बदलने के इंतज़ार में
थक गया था
दो जोड़ी कपड़ो से बीत गया था साल
न ठंड में ठंड लगी न गर्मी में गर्मी
बरसात रूमानी भी होती है
नही था मालूम
जिस बरसात को जानता था मैं
वो अचानक आती और भिगो देती थी
तार पर टँगी उल्टी बुरशट को

सब कुछ ठीक चलने के बाद
एक दिन चलता है
सब कुछ ठीक न चलना
जो बदल देता है
सारे विशेषण सर्वनाम में

ऐसा नही अब सब कुछ ठीक चल रहा है हमारे मध्य
जो लिख रहा हूँ मैं एक कविता
या बांट रहा हूँ ज्ञान मनुष्य की त्रासदी पर

अब बस इतना है कि
ठीक चलने और ठीक न चलने के बीच
जो कुछ अच्छी बातें याद रह जाती है
एकदम अपनी निरपेक्ष प्रकृति के साथ
उनके भरोसे मैं देख रहा हूँ
माया के उस विचित्र नियोजन को

जिसका दुनिया का
कभी एक कुशल अभियंता था मैं
उसी का आज दिहाड़ी मजदूर हूँ मैं
भूल गया हूँ अपनी सारी निपुणताएं
कर दिया खुद को मांग के हवाले
बस इतना भर याद है
कभी सब कुछ ठीक चल रहा था हमारे मध्य
जो अब नही है।

©डॉ. अजित


Saturday, April 22, 2017

उम्मीद

ये जो तेरी पलकों के छज्जे पर
सूखते हुए ख़्वाबों की परछाई है
जो हो इजाज़त मैं थोड़ी देर इसमें पनाह ले लूं
मेरा जिस्म जज्बाती धूप में झुलस गया है

ये जो तेरी आँखों में गुमशुदा इश्तेहार है
मैं उनसे रास्ता पूंछ लूं ज़रा
भटक गया हूँ मैं सही गलत के कबीले में

फ़कत इतनी इल्तजा है मेरी
तेरी जुल्फों के साए में
अपनी यादों की गुल्लक फोड़ कर
गिन लूं जमा की गई हसीं बातों की चिल्लर

एक बोसा तेरे कान पर टांग दूं
जो हवा देता रहे गर्म लू में तुम्हें हमेशा

मेरे पास कुछ ख्वाहिशों के अधूरे वजीफे है
कुछ शिकायतों के आड़े-तिरछे नक़्शे है
अनकही बातों  का शरबत है
जिसे घूँट घूँट लुत्फ़ लेकर पीना तुम कभी

ये सब तुम्हें सौंपकर मैं अब आराम चाहता हूँ
अपनी बेचैनियों से इंतकाम चाहता हूँ

इसलिए
मुन्तजिर हूँ तुम्हारी फुरसत और बेख्याली का
उम्मीदन तुम आओगी एकदिन
बारहा यूं ही खुद चलकर

उसी दिन आमद होंगी
कुछ कतरों की समन्दर में
और मुक्कमल होगा एक बेवजह का सफर
अपने तमाम अधूरेपन के साथ.

© डॉ. अजित


Friday, April 21, 2017

अन्यथा

ये बातचीत को अन्यथा
लिए जाने का दौर है
आप कहे पूरब
और कोई समझ ले
इसको निर्वासन की दशा

आप कहे मेरा वो मतलब नही था दरअसल
और तब तक मतलब निकल चुका हो हाथ से

इसलिए
बातचीत करते हुए लगता है डर
और बोल जाता हूँ कुछ ऐसा भी
जिसका ठीक ठीक मतलब नही पता होता
मुझे भी।

©डॉ. अजित

Wednesday, April 19, 2017

तुम उदास करते हो कवि...

पहले उसे मैं औसत लगा
फिर बेहतर
उसके बाद थोडा और बेहतर
मैं बेहतरी में आगे बढ़ ही रहा था कि
अचानक उसने कहा एक दिन
तुम कोई ख़ास पसंद नही हो मुझे
बल्कि कभी-कभी लगते हो बेहद इरिटेटिंग भी
मुझे अपनी घटती लोकप्रियता का दुःख नही था
मुझे दुःख इस बात का हुआ  
मैं सतत मूल्यांकन में था.
****
हमारी कुछ ही संयुक्त स्मृतियाँ ऐसी थी
जिनका एक सामूहिक अनुवाद संभव था
अन्यथा
हम चल रहे थे आगे-पीछे अपने अपने हिसाब से
जिस दिन हम अलग हुए चलते -चलते
उस दिन हमारे पास कुछ ऐसी स्मृतियाँ बची थी
जिन्हें बांचते समय लगता कि
हम साथ चल नही साथ बह रहे थे
किनारों से पूछने कोई नही जाएगा
मगर ठीक से वही बता सकता है
हम दोनों की अभौतिक दूरी.
***
ऐसा कई बार हुआ
उसे फोन किया और स्क्रीन पर नम्बर दिखने के बाद
काट दिया तुरंत
ठीक इसी तरह कुछ एसएमएस किए टाइप
और मिटा दिए तुरंत
ये घटनाएं मेरे द्वन्द, संकोच  या अनिच्छा को नही बताती है
ये दोनों बातें बताती है
समय से चूक जाने के बाद
तुम्हें किसी भी वक्त डिस्टर्ब करने का हक़ खो  बैठा था मैं.
***
हमारी बातें इतनी निजी है
जितनी धरती की अंदरूनी दुनिया
हमारी बातें इतनी सार्वजनिक है
जितना आसमान का फलक
हमारी बातों में थोड़ी थोड़ी
सबकी बातें शामिल है
इसलिए जब उदास होता हूँ मैं तो
कभी कभी
सुबक कर रो पड़ता है कोई अनजाना भी.
***
‘तुम उदास करते हो कवि’
किसी ने कहा ने एकदिन
कोई कविता पढ़ने के बाद
मैने जवाब में एक मुस्कान बना दी
यह सच है कि प्राय: लोगो को उदास करता हूँ मैं
क्यों करता हूँ
इसका सही-सही जवाब केवल तुम्हारे पास है
मगर तुमने कोई पूछने नही जाएगा
इसलिए मुस्कान मेरे पास
स्थाई प्रतीक है
अपना दोष स्वीकारने का.

© डॉ. अजित






Tuesday, April 18, 2017

अनिच्छा

ये जो तुम्हारा गूंथा हुआ जूड़ा है
मैं इसमें दूरबीन की तरह झांककर देखना चाहता हूँ
जिसके लिए कर लूंगा
मैं अपनी एक आँख बंद
किसी कुशल खगोल विज्ञानी की तरह
मैं  देखना चाहता हूँ कि
ये  दुनिया कितनी दिमाग के भरोसे  चल रही है
और कितनी दिल के

ये जो तुम धोकर और खोलकर सुखा रही हो अपने बाल
मैं इन्हें हवा में उड़ता हुआ देखना चाहता हूँ एक बार
ताकि पता कर सकूं हवा दक्खिनी है या पहाड़ा
परवा और पछुवा जानने के काफी है तुम्हारी लटें

तुम्हारी गर्दन पर प्रकाशित है
उस समंदरी टापू का नक्शा
जहां ठुकराए हुए लोग जी  सकते है सम्मान के साथ
उनसे  कोई नही करता वहां सवाल  
उसकी प्रतिलिपि मैं ले जाना चाहता हूँ अपने माथे पर
तुम्हारी अनुमति के बाद

तुम्हारे हाथों में सुना है बड़ी बरकत है
आज तक कभी कम नही पड़ा खाना रसोई में
मैं अपनी कलम एक बार तुम्हारे हाथों में देना चाहता हूँ
ताकि क्षमा और प्रशंसा के लिए
कभी कम न पड़े मेरे पास शब्द

ये जो तुम्हारी पलकें है
इनके बाल गिनना चाहता हूँ एक बार
ताकि मैं अपनी बोझ उठाने की क्षमता को परख सकूं
तरलतम परिस्थितियों में

मेरे इस किस्म के छोटे छोटे स्वार्थ और भी है
मगर उनका जिक्र नही करूंगा आज
आज केवल पूछूंगा इतना
क्या तुम्हें इतना भरोसा है खुद पर कि
मैत्री को बचा ले जाओगी
प्रेम के मायावी प्रेत से?

तुम्हें हो न हो मगर मुझे भरोसा है
इसलिए मैं कहता हूँ
ये जो तुम्हारी आँखें है
इनमें साफ-साफ़ दिखता है
भूत और भविष्य एक साथ
मैं दोनों के बीच में वर्तमान
टिकाना चाहता हूँ थोड़ी देर
बशर्ते तुम अनिच्छा से आँखें न मूँद लो.

© डॉ. अजित




Saturday, April 15, 2017

दोस्ती

एक बुरे दौर में
मैंने दोस्तों की तरफ
मदद की उम्मीद भरी निगाह से देखा
कभी ये मदद आर्थिक थी
तो कभी मानसिक
कुछ दोस्तों को मेरी उम्मीद नही दिखी
बस केवल मैं दिखा
मजबूरी की एक कमजोर
प्रस्तुति थी शायद मेरे पास
कुछ दिन ऐसे दोस्तो से मैं रहा बेहद नाराज़
फिर मैंने पाया
मेरी नाराज़गी कोरी भावुकता से भरी थी
जो लगने लगी अप्रासंगिक
कुछ महीनों बाद
दरअसल
बुरे वक्त में दोस्त की मदद न कर पाना
जरूरी नही दोस्त की काहिली हो
कई बार हमारी पात्रता होती है कमजोर
और मदद हो जाती है किसी
लौकिक जटिलता की शिकार

कई बार एक बुरे दौर में
मैने दोस्तो की तरफ
मदद की भरी निगाह से देखा
और दोस्तों ने
मदद की मेरी उम्मीद से बढ़कर
पढ़ लिया मेरा मन
कई कई साल जिक्र तक नही किया
उधार के पैसों का
जो उनके गाढ़े खून पसीने की कमाई थी
शराब के बाद की मेरी 'झक' को
झेला पूरी विनम्रता के साथ
सार्वजनिक रूप से बताते रहें वो
मुझे बेहद प्रतिभाशाली
ऐसे दोस्तो के प्रति
मैने कोई कृतज्ञता प्रकट नही की आजतक
हमेशा लिया इसे एक हक की तरह

ये दो अलग अनुभव नही दरअसल
ये दोस्ती की दो आंखें हैं

इसलिए
नही लिया जाना चाहिए
दोस्तों की बातों को बहुत व्यक्तिगत
बचाए जाने चाहिए रिश्तें
नाराजगियों के बावजूद
दोस्त दरअसल हमारे दोस्त के अलावा
अलग अलग मोर्चो पर लड़ते मनुष्य भी है
जो कहीं जीतते है तो
कहीं हार जाते है

दोस्ती के हिस्से में हमेशा जीत नही होती
मगर दोस्ती के साथ कोई हार
कभी स्थाई भी नही होती

दोस्ती को बचाना
ज़िन्दगी में हार को स्थगित करना है
इस स्थगन के लिए अपेक्षा की हत्या
करनी अनिवार्य पड़े तो
कर देनी चाहें यकीनन
चाहें दिल मानें या न मानें।

©डॉ. अजित

Wednesday, April 12, 2017

कमतर

उसने कहा एकदिन
तुम तो औसत से भी कमतर निकले
मैं तुम्हें बेहतर समझ रही थी
मैंने पूछा
ये बात गुस्से में कह रही हो या सच में
उसने कहा
जैसा तुम समझो तुम्हारी मर्जी
मैंने कहा कमतर को
इतनी छूट देने के लिए शुक्रिया
तुम बेहतर हो अब इस पर
कोई संदेह नही है मुझे।
***
मैंने कहा एकदिन
देखना आंख में कुछ चला गया है
उसने कहा मुझे दिखाई न देगा
मैंने कहा क्यों?
इसलिए क्योंकि मैं ज्यादा
नजदीक हूँ तुम्हारे।

***
हमारी अधिकतर लड़ाईयां
बेवजह की थी
मसलन एकदिन उसने पूछा मुझे
प्यार आदमी की जरूरत है या
आदमी को जरूरत से प्यार करना पड़ता है?
मैंने कहा एक ही बात तो हुई
इस पर वो बिगड़ गई और कहा
तुम हमेशा सवालों से बचते हो
मैंने कहा हां !
मै सवालों से नही जवाबों से बचता हूँ।
***
परसों उसने पूछा
मेरे बिन रह सकोगे तुम
मैंने कहा शायद
उसने मुस्कुराते हुए कहा
अच्छी बात है
इस शायद को कभी मत छोड़ना
चाहे मैं रहूँ या न रहूँ।

©डॉ. अजित 

ब्रेकअप के बाद

ब्रेकअप के बाद
उठ गया था रेखाओं से विश्वास
शुक्र बुध मंगल पर्वत डूब गए थे
अविश्वास के समन्दर में
हथेली देखते वक्त नजर आता था बस पसीना
वो उड़ रहा था
बहने के लिए नही मिलती थी उसको जगह
हाथ तंग हो गया था मेरा

भटक गया था मन का भूगोल
अटक गया था यादों का खगोल

कलाई पर जो बंधा था शुभता का धागा
उसको काटने की तमन्ना होती थी रोज़
चाहता था रास्ते मे न आए कोई मंदिर
प्रसाद को न करना पड़े इनकार

ब्रेकअप के बाद
सूरज शाम को चिढ़ा कर जाता था
सुबह आकर जगाती नही थी
पक्षियों की आवाजें लगती थी कोलाहल
डायरी में दर्ज हर्फ उलटे हो गए थे सब के सब

शराब का ख्याल आता मगर दिल न करता था
एक भी घूंट पीने को
अपने सुकूँ के लिए बड़ी लगती थी ये कीमत

ब्रेकअप के बाद
दिल मे क्या तो कोई सवाल न था
या फिर जवाब ही जवाब थे
जवाब कोई सुनता न था
और सवाल पूछने के लिए जगह न बची थी

ब्रेकअप के बाद
सम्वेदना का था एक बुद्धिवादी संस्करण
भावुकता का था एक लिजलिजा कलेवर
इन दोनों के मध्य दिल था
थोड़ा उदास ज्यादा निरुपाय

ब्रेकअप के बाद जो भी था
वो ठीक नही था
कितना ठीक नही ये नही बता सकता
क्यों नही बता सकता
इसकी वजह समझ आई
ब्रेकअप के बाद।

©डॉ. अजित

Friday, March 31, 2017

बोध

लौटते वक्त उसका चेहरा उदास नही था
लौटते वक्त उसके पास कहने के लिए
बहुत कुछ था
लौटते वक़्त उसके पास वक्त का अनुमान नही था
लौटते वक्त उसके पास एक सीधी पगडंडी थी
जिसके रास्ते में कई चौराहे थे

लौटते वक्त मंजिल सामने थी या पीछे
यह बता पाना जरा मुश्किल था
लौटते वक्त आसमान थोड़ा टेढ़ा था
और धरती थोड़ी चकोर
लौटते वक्त हवा कानों के नीचे से बह रही थी
हवा की छुअन में कोई नूतनता न थी

लौटते वक्त उसने घड़ी को देखा
उसे लगा देर हो गई लौटने में
लौटते वक्त घड़ी को देखना
बेहद नीरस घटना थी
इसलिए नही कि देर हो गई थी
बल्कि इसलिए कि
लौटते वक्त उसे समय का बोध हो गया था।

©डॉ.अजित

Monday, March 27, 2017

गाँव

कहीं दूर हमारी स्मृतियों का
एक गाँव है
जहां थोड़ी धूप थोड़ी छाँव है
एक पगडण्डी उस तरफ जाती है
जहां रास्ता खत्म होता है
और मंजिल नजर आती है

ये गाँव इतनी दूर है
कि हम पहुँच जाते है पल भर में
ये गाँव इतना नजदीक है
देख नही पाते फिर भी उम्र भर में

स्मृतियों के गाँव में
बेवकूफियों का एक टीला है
प्यार में पल पल मरते-जीते
अहसासों का भी एक कबीला है

हम जब खुद से खफा होते है
चाहे अनचाहे बस यहां होते है
दर दर भटकते थक जाते
जब मन के पाँव
किसी आंगन में यहीं मिल पाती
फिर ठंडी छाँव

देस-बिदेस रहे कहीं भी
छूटे चाहे मन की मीत
यही वो गाँव है
छूटे न जिससे कभी प्रीत

स्मृतियों के गाँव के अनगिनत किस्से है
मिले बिछड़े लोगो के भी अपने हिस्से है

पुनर्पाठ:

स्मृतियों का गाँव अजनबी आबादी से भी आबाद हो सकता है और परिचय के संसार के बाद की वीरानियाँ भी यहां बची रह सकती है।ये गाँव हम सब के अंदर बसता है मन के भूगोल के हिसाब से इसका मानचित्र तय करना जरा मुश्किल काम है। इस गाँव जाने का रास्ता हम भी नही जानते कोई हाथ पकड़ कर ले जाता है फिर लौटना हमें खुद होता है,कभी मुस्कुराते हुए तो कभी उदास होते हुए।

©डॉ.अजित

भूलना

मुझे भूलने की कोशिश में
पहले उसने संपर्क कम किया
फिर खुद को मजबूत किया
और बाद में खींच दी एक रेखा
जिसके आर पार
नही देख सकते थे हम
एक दूसरे की शक्ल

सम्बन्धो की कर्क रेखा पर
कोई बाड़ ऐसी न थी
जिससे रोका जा सकता हो
यादों की पुरवाई को
बस यही एकमात्र
तकलीफदेह बात थी

मुझे भूलना उसने
एक चुनौती की तरह लिया
और भूल गई जिद करके
वो जिद की इतनी पक्की है
नही करेगी कभी याद भूलकर भी
ये बात पता है मुझे

मैं याद करता हूँ उसे तो
इतनी अच्छी बातें याद आती है
उदासी में भी मुस्कुरा पड़ता हूँ
तल्खियां सब लगने लगती है हास्यास्पद

वो मुझे भूल गई है हमेशा के लिए
ऐसा भी नही है
हमेशा के लिए कोई
किसी को नही भूल पाता है
बस आजकल वो याद नही करती मुझे

जब याद आती है मुझे
उसके भूलने को कर लेता हूँ याद
फिर भूल जाता हूँ
खुद का वजूद
फिर न उसकी याद आती है
न खुद की

भूलना अतीत का बुद्धिवादी अनुवाद है
जिसका कभी पाठ नही होता है
जिल्द चढ़ाकर रख दिया जाता है जिसे
रिश्तों के अजयाबघर में।

©डॉ.अजित

Friday, March 24, 2017

सुविधा

हंसते हुए उसकी आँखे मिच जाती थी
रोते हुए उसके चेहरे पर रोष नही होता था

बोलते हुए वो बातों के अरण्य में भटक जाती थी
नाराज़गी में वो चुप हो जाती थी
नही चलता था पता कि कहां है वह

पुकारना होता था फिर उसे
अपनी पूरी गहराई के साथ

चाय पीते वक्त उसे एक पैर हिलाने की आदत थी
सटकर बैठना उसे नही था कोई ख़ास पसन्द
उसके हाथ में कलम होती जब
चश्मा चढ़ा लेती थी वो बालों के ऊपर

बहस में हो जाती वो थोड़ी आक्रमक
कविता सुनकर होती थी उसकी आंखें नम
चिढ़कर वो नही मारती थी कभी व्यंग्य
ये काम ख़ुशी के लिए रखा था उसने

उसकी बातों मे बसती थी बासी रोटी की महक
उसकी योजनाएं खट्टी मिट्ठी चटनी सरीखी थी
उसके अनुमान होते थे प्रायः सत्य के निकट
वो जान लेती थी भूख और प्यास का ठीक ठीक अनुपात

ये उसकी कुछ आदतें है
जो याद है मुझे अभी तक
जो भूल गया वो एक ख्याल था
जिसमें थोड़ा रंज थोड़ा मलाल था

उसकी बातें न खत्म होने वाली है
उन्हें इस कविता की तरह यह सुविधा नही
कि खत्म हो जाए एकदम से।

©डॉ.अजित

Friday, March 17, 2017

अनजान

समन्दर से नदी पूछती है
तुम्हारे तल पर रहती है क्या
तुम्हारी प्रेमिका?

समन्दर कहता है
मैं सतह के अधीन हूँ
नही देख पाता
तल पर कौन रहता है

नदी विश्वास कर लेती है
इस बात पर
और देखना शुरू कर देती है अपना तल

नदी के किनारे पर कौन रहता है
नही जान पाती नदी फिर

नदी का किनारा
समन्दर को नही जानता
मगर फिर भी रहता नाराज़ उससे

समन्दर का तल नदी की प्रतिक्षा करता है
वो नही पहुँच पाती वहां तक

दोनों अपने अनुमानों के सहारे मिलते है
और खो जाते है एकदिन

जानकर अनजान रह जाना
इसी को कहा जा सकता शायद
समन्दर और नदी की ये बात
जो जानता है
वो नही बताता दोनों को
लापरवाही या चालाकी
इसी को कहा जा सकता है शायद।

©डॉ.अजित

Sunday, March 12, 2017

सच झूठ

उसने पूछा
एक सच्चे कम्युनिस्ट का नाम बताओ
एक सच्चे फेमिनिस्ट का नाम बताओ
मैंने कहा
एक सच्चे प्रेमी का नाम बताऊं?
उसने कहा
नही मुझे अपोरचुनिस्ट का नाम नही जानना
क्या प्रेमी अवसरवादी होता है
मैंने प्रतिवाद किया
अवसरवादी तो पूरा कह नही सकती मगर
प्रेमी सच्चा प्रतीतवादी होता है
वो वही सब प्रतीत करवा देता है
जो कभी न रहा हो।

***
क्या तुम फेमिनिस्ट हो
उसने पूछा एकदिन
नही मैं वाक्यों के मध्य अटका ट्विस्ट हूँ
तुम उपयोग कर सकती है
जिसे अपने हिसाब से।

***
तुम्हारी क्या आइडियोलॉजी है?
लेफ्ट,राइट,सेंटर या न्यूट्रल हो
मैं वृत्त की तरह गोल हूँ
जहां से चलोगी वही पर
लौट आओगी एकदिन तुम
तुम इतना सावधान क्यों हो?
नही मैं तो लापरवाह मानता हूँ खुद को
मानते हो मगर हो नही
तुम्हारे हिसाब से क्या हूँ मै?
हिसाब तो रखा नही कभी
मगर पुरूष होने के बावजूद मासूम हो
मासूमियत ही तुम्हारी आइडियोलॉजी है।
***

क्या सुन रही हो आजकल
मैने यूं ही पूछ लिया एकदिन
जगजीत सिंह को
मुझसे बिछड़कर खुश रहते हो मेरी तरह तुम भी झूठे हो...
बिछड़ कर कौन खुश रहता है,मैंने पूछा
वही जो कभी मिले नही हो
और जो मिले हो कभी?
वो झूठ बोलकर खुश रहते है
ख़ुशी यानि झूठ की मांग करती है
मैंने बात बदलते हुए कहा
ऐसा भी नही है, दरअसल
झूठ बोलना सच का हिस्सा होता है कभी कभी
अपना अपना सच
अक्सर अकेले में झूठ बोलता है।

©डॉ.अजित

उत्सव

तुम्हारे अंदर उत्सव को लेकर
कोई उल्लास,उत्साह नही देखा कभी
कितने बोर आदमी हो तुम
जीवन के हर उत्सव को खारिज़ करने के
दार्शनिक तर्क है तुम्हारे पास
दरअसल वो सब भोथरे पलायन है तुम्हारे
तुम खुद से भाग रहे हो
इसलिए चाहते हो एकांत
भीड़ शोर हंसी में तुम्हें खो जाने का भय है
पिछली मुलाक़ात पर
ये सब बातें उसने लगभग एक साथ कही
मैं एक एक का जवाब देना चाहता था
मगर वो इतने प्रवाह में थी उसे सुनना नही था
वो दिन उसके कहने का दिन था
और मेरे सुनने का
जब मैंने अपनी सफाई में कोई दलील न दी
उसे लगा मैं सहमत हूँ उसकी स्थापनाओं से
वो चाहती थी कि उसको गलत साबित करूँ
बहस में नही जीवन में
मैंने कहा मौलिकता की अपनी एक स्वतंत्र यात्रा है
कुछ भी होना या न होना क्षणिक नही
शायद हमारा खुद का चयन भी नही
मनुष्य का हस्तक्षेप एक भरम है
उसका संस्करण निर्धारित होता अप्रत्यक्ष से
बेहद अरुचि से उसने मेरी बातें सुनी और कहा
इतनी भारी भारी बातें मेरी समझ से परे है
शायद तुम जीना भूल गए हो
जीवन बिखरा होता है छोटी छोटी खुशियों में
जिसे खुद ही तलाशना होता है
उम्मीद है एकदिन तुम सीख लोगे तलाशना
बस मेरे खो जाने से पहले तलाश लेना
मैं चाहती हूँ तुम्हारे जीवन में बचा रहे उत्सव
हर हाल में
मेरे साथ भी,मेरे बाद भी।

©डॉ.अजित

Friday, March 3, 2017

खालीपन

मुद्दत तक इतना खाली रहा हूँ मै
यदि कहूँ आज बिजी हूँ थोड़ा
सुनने वाले को लगता है
ये नया झूठ है मेरा
और बेवजह का भाव खा रहा हूँ

मैं सदा उपलब्ध रहा हूँ
फोन पर
असल में
सपने में
चिट्ठी पत्री में

मेरी सदा उपलब्धता
एक क्षेपक की तरह उपस्थित रही जीवन में

इतना खाली और औसत जीवन था मेरा
मेरे पास कई-कई साल नए लतीफे न होते
इतना कम घटना प्रधान  जीवन था मेरा
कि मै इतना ही बता सकता था रोचकता से
फलां दिन इतनी देर से बस मिली थी मुझे

निठल्लेपन के बर्तन में पानी को
शराब समझ कर पीता रहा हूँ मै
मेरी बातों में जो लचक बची है
ये उन्ही दिनों की देन है

मेरे पास कोई किस्सा ऐसा नही
जिस पर किसी को रश्क हो सके
मेरे पास अधिकतम बातें
बेवकूफी भरे सपनें देखने की हो सकती है
सपनों का पीछा करना मुझे कभी नही आया
मैं बदलता रहा हूँ सपनें
देशकाल और परिस्थिति के हिसाब से
जिसके लिए
सपनो ने कभी माफ नही किया मुझे

फोन पर कुछ ही देर में
दो वाक्य जकड़ लेते है
मेरी ज़बान
और बताओ...
सब बढ़िया....
या फिर खिसियाकर हंसने लगता हूँ
ताकि हंसी के शोर बढ़ जाए बात आगे

मैने बनाया खुद को आग्रह के समक्ष कमज़ोर
मीलों की यात्राएं केवल मेल मिलाप के लिए
मतलब की बात पर सिल गए होंठ
मैसेज भेजकर मांगे पैसे उधार
और भी किस्म किस्म की मदद

दोस्तों में रहा चिट्ठीबाज़
जताई सारी नाराज़गियां
खतों के जरिए

दरअसल,
मैं उपलब्ध था
मैं उपस्थित था
मैं तत्पर था
मैं कतार में था
मैं विचार में था
मैं व्यवहार में था

इन सब का एक अर्थ यह भी था
मैं अपने खालीपन के साथ
अपने संपर्कों के प्यार में था

जिसे कुछ समझ पाएं
और कुछ नही
जो नही समझ पाएं
उनसे कोई शिकायत नही मुझे
उन्होंने मुझे चुना या मैंने उन्हें
इनसे ज्यादा जरूरी यह था
मुझे वक्त ने चुना था
सुनने के लिए

सुनाने के विषय सदा से कम रहे मेरे पास
इस बात का खेद है मुझे
मेरी अनुपस्थिति में
शायद ही किसी को याद आता हो
मेरा कोई किस्सा

मैं लोगो के जीवन में शामिल रहा
एक कविता तरह
इसलिए भी लोगो के जीवन में
कहानी की तरह याद नही
कविता की तरह विस्मृत रहा हूँ मै।

©डॉ.अजित

Thursday, March 2, 2017

दौर

ये एक ऐसा दौर है
जब आप दो जमा दो कहते हुए भी मारे जाएंगे
और दो जमा दो पांच कहते हुए भी
उल्लास के शोर में हिंसा छिपी है
और देशभक्ति अब बेहद लोकप्रिय चीज़ है
इतनी लोकप्रिय कि
आपके चुप्पी भरे डर को भी देश के खिलाफ
समझा जा सकता है

इस दौर में जो
लिख और बोल रहे है
उनके परिजन विश्व के सबसे अशान्त नागरिक है
वो चाहते है कि चुप रहना सीखना चाहिए
चाहिए में फिर भी एक आग्रह हो सकता है
मगर अब चुप रहना सीखना पड़ेगा
इस बात की ध्वनि आदेशात्मक है

पिछले दिनों में
बदल गए है बहुत से व्याकरण
असुविधा अब एक समिधा है
आप कितने ही नास्तिक क्यों न हो
आपका यज्ञ में शामिल होना अनिवार्य है

झूठ बोलने पर अब खेद का प्रावधान नही है
सच बोलने पर सजा तय है
भीड़ है जयकारा है और सब कुछ
सही होने की एक उपकल्पना है

जबकि
इस दौर में सब कुछ सही नही है
इसी दौर में
कवि को लहुलुहान कर देता डीटीसी का कंडक्टर
क्योंकि कवि को था
सार्वजनिक जगह पर मूतने पर ऐतराज़

दरअसल
ये हर ऐतराज़ पर मूतने का दौर है
जिसमे कमजोर आदमी का घायल होना लाज़मी है
देश के पुनर्निमाण में
वैसे ही कमजोर आदमी की जरूरत नही होती

इस दौर में देश मजबूत हो रहा है
और आदमी कमजोर
मगर हमें इस पर कोई खेद इसलिए नही है
हम उम्मीद से भरे लोग है
इतनी उम्मीद से भरे कि
मनुष्य को मनुष्य के खिलाफ संगठित करते समय
भूल जाते है हर किस्म का डर

इस दौर में घृणा प्रेम से बढ़कर स्वीकृत है
इतनी स्वीकृत कि
बसन्त में पतझड़ पर हम लिख सकते है कविताएं
विलाप में सुन सकते है तान
बलात्कार को सिद्ध कर सकते है प्रतिशोध का साधन

इन बातों में कोई नूतनता नही है
सब जानते है इन्हें
महसूसते सब है अपने आसपास
मगर कोई कहेगा नही
मैं कह रहा हूँ तो एक जोखिम को दे रहा हूँ निमंत्रण
मैं चाहता हूँ मेरे बाद
दस्तावेज़ में दर्ज हो ये दौर
जब आदमी को आदमी पर भरोसा कम है
आदमी का भरोसा चमत्कार का दास है अब

चमत्कार को नमस्कार करना
नही सीख पाया आजतक
तभी लिख कर ये सब
मिटा रहा हूँ अपना डर
दरअसल
ये भयभीत होने का दौर है
जिसके लिए लिखनी पड़ी है
मुझे इतनी लम्बी चौड़ी भूमिका।

©डॉ.अजित

निराश

प्रार्थनाओं से निराश व्यक्ति
जब करता है प्रेम
वो सबसे पहले खारिज़ करता है
प्रेम के दिव्य संस्करण को

ईश्वर या कोई भी ईश्वरीय चीज़
भरती है उसके अंदर एक गहरी खीझ
मनुष्य के शिल्प में नही देखना चाहता वो
चार ऐसे हाथ जो एक भी काम न आए बुरे वक्त पर

वो नही पड़ना चाहता
प्रेम के लौकिक और अलौकिक संस्करण में
वो महसूसता है कामनाओं का ताप
और विरह के जरिए मुक्ति एक साथ
वो तत्कालिकता का होता है ऐसे अभ्यस्त कि
नही बाँध पाता खुद को किसी चमत्कार की आशा में

निराश वैसे एक नकारात्मक शब्द समझा जाता है
मगर प्रार्थनाओं से निराश व्यक्ति
जब करता है प्रेम
वो मनुष्यता को देता है सबसे गहरी उम्मीद
इसी उम्मीद के सहारे
दिख और मिल जाते है ऐसे प्रेमी युगल

जिन्हें देख बरबस मुंह से निकल सकता है
'ईश्वर ने ऐसा कैसे होने दिया भला'

©डॉ.अजित

Monday, February 27, 2017

सपनें

इनदिनों मुझे उसकी कोई बात
अच्छी नही लगती
वो सलाह देती है तो
नसीहत जैसा महसूस होता है
वो उत्साह के साथ कुछ शेयर करती है तो
मैं अनमना होकर
चस्पा कर देता हूँ एक यांत्रिक स्माइल
फिल्मों,किताबों,यात्राओं को लेकर बोलता हूँ झूठ
बिलकुल निठल्ला हूँ
फिर भी अभिनय करता हूँ अति व्यस्त होने का

ये बात उसे भी ठीक ठीक पता है
अब पहले जैसा नही रहा हूँ मै
हैरत ये उसने ऐसा कभी कहा नही
वैसे जिस दिन वो कहेगी भी
उसका भी जवाब है मेरे पास

मैं दार्शनिक हो कहूँगा
आजकल खुद के साथ नही हूँ मैं
इस जवाब से उसे रत्ती भर फर्क न पड़ेगा
वो जानती है मेरी मासूमियत और चालाकी
वो जान लेगी मेरी तमाम अनिच्छाएं
उसका धैर्य किसी
विकल्पहीनता की उपज नही है
फिर भी वो कर सकती है मेरा
जन्म जन्मान्तर तक इंतजार

मैं उससे कह सकता हूँ
अपना सारा सच बे लाग लपेट के
वो इसे सुन सकती इसे एक घटना के तौर पर
वो मेरे बारे में कोई राय कायम नही करती
ये मेरे लिए अच्छी बात है

इनदिनों वो मुझे अनमना देख
गाहे बगाहे पूछ लेती है एक बात
सपनें आना अच्छी बात है या खराब
मैं कह देता हूँ
सपनें आना खराब है
और देखना अच्छी बात।

©डॉ. अजित

Saturday, February 18, 2017

आख़िरी कविता

मेरे शब्दकोश से क्षुब्ध होकर
अरुचि का शिकार हो जाएंगे
एकदिन लोग

पुनरुक्ति को देख वो समझ लेंगे
इसे मेरा स्थाई दोष
नही रहेगी मेरी बात में कोई नूतनता
हर दूसरे दिन खुद को खारिज़ करता जाऊँगा मैं

शब्दों से छनकर बह जाएगी सारी सम्वेदना
शिल्प के खण्डहर में अकेले होंगे अनुभव
तब कहने के लिए नही बचेगा
मेरे पास कुछ भी शेष
मौन रूपांतरित हो जाएगा निर्वात में

इतनी नीरवता में मेरा चेहरा देखकर
जिन्हें याद आएंगी कुछ मेरी पुरानी कविताएं
उनका प्रेम देख शायद रो पडूंगा मैं

कवि के तौर पर
यह मेरी आख़िरी अशाब्दिक कविता होगी।

©डॉ.अजित

Tuesday, February 14, 2017

संवाद

प्रेम में अपदस्थ प्रेमी
से जब पूछा मैंने
अपना अनुभव कहो
उसने कहा
मेरा कोई अनुभव अपना नही
प्रेम के बाद कुछ अपना बचता है भला?

मैं इस बात पर हंस पड़ा
उसने कहा तुम प्रेम के अध्येता हो
प्रेमी नही
मैंने कहा आपको कैसे पता
प्रेम में कोई दुसरे की बात पर हंसता है भला?

अब मै थोड़ा उदास हो चुप बैठ गया
अब तुम पात्रता अर्जित कर रहे हो
मुझे सुनने की
मगर मै जो कहूँगा वो मेरा होगा
यह संदिग्ध है
मेरे बारे में पूछना तो उससे पूछना
जिसे मै याद हूँ भूलकर भी

मैंने कहा आप क्या बता सकेंगे फिर?
मैं बता सकूंगा सिर्फ इतना
मैंने जीना चाहा तमाम अभाव और त्रासदी के बीच
मैंने पाना चाहा तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद
मैंने बाँट दिया खुद को कतरा कतरा
मैंने खो दिया उसको लम्हा लम्हा
इस बात पर मुझे पुख़्ता यकीं है
वो साथ है भी और है भी नही।

©डॉ.अजित

Friday, February 10, 2017

देव

हो सके तो सम्बोधनों के
षडयंत्रो से बचना
पति को देव कहने से बचना

देव आदर्श भरी कल्पना है
मिथको से घिरी एक अपवंचना है
मनुष्य जब देवता बताया जाता है
फिर वो कर देता है इनकार
मनुष्य को मनुष्य मानने से
समझने लगता है खुद को चमत्कारी

प्रेम की चासनी में लिपटे
बहुत से चमत्कार तुम समझ न पाओगी
आत्म गौरव को देवत्व के समक्ष बंधक पाओगी
साथी के तौर पर कोशिश करना
तुम्हारा साथी मनुष्य रहे
और तुम्हारा साथ उसे बनाए
और एक बेहतर मनुष्य

यदि तुमनें एक बार उसे बना दिया देव
फिर वो भूल जाएगा कमजोरियों पर माफी माँगना
सीख लेगा वो अधिपत्य घोषित करना
एकदिन तुम्हें बता देगा तुम्हारी ही नजरों में
सबसे निष्प्रयोज्य
घोषित कर देगा अपनी कृपा का घोषणापत्र

मत मानना पुराणों के शब्द विलास
गढ़ना अपने सह अस्तित्व का शब्दकोश
समझना और बरतना बराबरी के सुख दुःख
मत कर देना खुद को प्रस्तुत
देवता के स्वघोषित साम्राज्य में दास की तरह

प्रेम में एक बार देव कहोगी
दुःख में भूल जाओगी असल के देवता को भी
दरअसल
देवता कोई नही होता है
असल के देवताओं के भी अनन्त किस्से है छल के

पति को देव बनाना
उस छल को निमंत्रित करना है
जिसकी शिकायत किसी से नही कर सकोगी
और यदि करोगी भी
सारी सलाह और समायोजन तुम्हारे हिस्से आएगी
दब जाओगी जिसके बोझ तले असमय

पति का एक नाम है
उसी नाम से पुकारना
देव कहने से बैचेन होगा असल का पति
खुश होगा देव बनने को बैचेन पति

बस यह सूत्र रखना याद
और तय करना प्रिय पति का संबोधन
बतौर माँ यही
आख़िरी सलाह है मेरी।

© डॉ.अजित

Monday, February 6, 2017

कमजोरी

मैंने कहा मेरी अंग्रेजी कमजोर है
ये बात मैंने कमजोरी से ज्यादा
ताकत के तौर पर इस्तेमाल की अक्सर
अंग्रेजी पढ़ते वक्त हिंदी में सोचता
तो गड़बड़ा जाते सारे टेन्स
इज एम आर वाज़ वर लगते मुझे दोस्त
उनके साथ आई एन जी जोड़
छुड़ा लेता था अक्सर अपना पिंड
यह मेरी अधिकतम अनुवाद क्षमता थी

एक्टिव वॉयस और पेसिव वॉयस का भेद
मुझे आजतक नही समझ पाया
मै क्रिया कर्ता कर्म तीनों को समझता रहा
मुद्दत तक एक ही कुनबे का

भाषा को लेकर हमेशा रहे मेरे देहाती संकोच
मैंने साइन बोर्ड पढ़कर याद रखे रास्ते
इस लिहाज से अंग्रेजी काम आई मेरी
कुलीन जगह पर अंग्रेजी बोलने के दबाव के बावजूद
मैंने हिंदी को चुना
चुना क्या दरअसल मैंने चुप रहने का नाटक किया
क्या तो प्राइस टैग पलटता रहा
या मेन्यू देखता रहा बिना किसी रूचि के
ऐसे मौकों पर दोस्तों ने बचाई जान
उनके सहारे मेरा सीना तना रहा
ये अलग बात है कभी वेटर तो कभी सेल्स पर्सन
भांप गया ऑड और एवन में मुझे बड़ी आसानी से

ये बातें मैं अतीत का हिस्सा बताकर नही परोस सकता
ना ही अपने किसी जूनून का विज्ञापन कर सकता
मै जीता रहा भाषाई अपमान के मध्य
अपनी स्वघोषित अनिच्छा का एक बड़ा साम्राज्य
मैंने लूटे अक्सर भदेस होने के लुत्फ़

यहां जितनी बातें की उनकी ध्वनि ऐसी रखी
जानबूझकर कि लगे सीख गया हूँ
ठीक ठाक अंग्रेजी अब
मगर सच तो ये है
आज भी मुझसे कोई पूछे
जूतों के फीते की स्पेलिंग
मै टाल जाऊँगा उसकी बात हंसते हुए

कुछ और भले ही न सीखा हो मैंने
मगर मैंने सीख लिया है
अज्ञानता को अरुचि के तौर पर विज्ञापित करना
अंग्रेजी की तो छोड़िए
इस बात के लिए मुझे हिंदी ने
माफ़ नही किया आज तक

मेरी वर्तनी में तमाम अशुद्धियां
हिंदी की उसी नाराज़गी का प्रमाण है
जिनसे बचता हुआ आजकल
मैं खिसियाते हुए ढूंढ रहा हूँ
एक बढ़िया प्रूफ रीडर
जो कम से कम मेरा दोस्त न हो।

©डॉ.अजित

Sunday, February 5, 2017

रिहाई

जाओ !
एक नफ़ासत से जुदा हो जाओ
तल्खियों को यतीम कर दो
हो सके तो इस विदाई को हसीन कर दो

मैंने चुन लिए चंद मासूम लहजे
मैं बुन रही हूँ ख्यालों की रेशमी डोर
मै कात रही हूँ यादों के चरखे पर
अच्छी बातों का सूत
जिनके भरोसे पोंछा जा सकेगा
आषाढ़ की भरी उमस में पसीना

नही मुझे कोई शिकायत नही तुमसे
ये कोई बड़प्पन नही
ना ये दिखावे की ख़ुशी की कोई नुमाईश है
दरअसल जब जाना ही तय हुआ है
मैं चाहती हूँ तुम जाओ
सावन के बादल की तरह
जनवरी की धूप की तरह
इतवार की छुट्टी की तरह

आओ ! तुम्हारे माथे पर
एक शुष्क बोसा चस्पा कर दूं
तुम्हें इतने नजदीक देख
अब साँसे तरल न रह सकेंगी
दरअसल ये महज एक बोसा नही
ये दो अलग टापूओं का नक्शा है
रिहाई और विदाई यहीं भटका करेगी
आज के बाद

जाओं !
अब कोई पुकार नही शामिल
तुम्हें मुड़ते हुए देखना चाहती हूँ
उस मोड़ से
जहां चौराहे छोड़ देते है रास्तों का साथ
मुसाफिर जहां असमंजस के साथ
बदल लेता है रास्ता
इस उम्मीद पर
वो पहुंच जाएगा एकदिन कहीं न कहीं

यही मैं चाहती हूँ
तुम पहुँच जाओं कहीं न कहीं
बस अब यहां नही।

© डॉ.अजित

Sunday, January 29, 2017

विकल्प

यात्रा का आरम्भ बिंदु
होता है बेहद कोमल निस्पृह और पवित्र
फिर विकल्प उपस्थित होते है आसपास
कौतुक की शक्ल में

यही से होता है आरम्भ चयन भेद विशेषण का
विकल्प एक सुविधा है
जिसकी असुविधा व्याप्त रहती है दूर तक

शब्द भाव संवेद जब होते है हस्तांतरित
संकल्प मुस्कुराता है विकल्प की चालाकी पर
विकल्प देता है हौसला हंसी के प्रतिउत्तर में

ये नही वो तो सही
बहुत है अभी चमन में दीदावर।

© डॉ. अजित

ग्लानि

कुछ दिनों से
उससे खिंचा खिंचा सा रहता हूँ
मेरे जवाबों मे तल्खियां रहती है
जानता हूँ सब बेवजह की है
मगर
उसको एक सिरे से खारिज़ करता चला जाता हूँ

किसी को खारिज़ करना सुखप्रद हो सकता है
मगर उसको खारिज़ करके
हमेशा गहरे पश्चाताप से गुजरता हूँ
हैरत इस बात की है
ये पश्चाताप मुझे बदलता नही है

मुझे कोई नाराजग़ी नही है
मैं खुद से भी खफा नही हूँ

दरअसल
क्यों कर रहा हूँ ये सब
मुझे खुद पता नही है

इसलिए लिख कर कम कर रहा हूँ
अपनी ग्लानि
ग्लानि केवल लिख रहा हूँ
महसूस करते समय बंद कर लेता हूँ दरवाजा

जहां मुझे कोई नही देख रहा
वहां तुम देख रही हो मुझे

मैं छिपने के लिए जगह तलाश रहा हूँ
यह कविता उसी जगह की तलाश के नाम
की गई एक ज्यादती है।

© डॉ.अजित