Wednesday, August 16, 2017

शुभकमनाएं

लगातार विजय के कारण
मैं अब  थकने लगा हूँ
अब मैं हारना चाहता हूँ

सहमत लोगो से मैं
उकता गया हूँ
मुझे  स्थायी तौर पर
कुछ असहमत दोस्त चाहिए
जो बता सके मेरे गलती
मेरी आँखों में आँखें डालकर

मैं कुछ दिन भीड़ की बीच रहना चाहता हूँ
जहां कुछ इस तरह का एकांत हो कि
कोई किसी को न जानता हो आपस में

मैं मरने से पहले
जीने का पता चाहता हूँ
ताकि उसके गले मिलकर
कह सकूं धन्यवाद

अब मैं दुखों पर कोई निजी बात
नही करना चाहता हूँ
अब मैं बस इतना चाहता हूँ कि
मैं क्या चाहता हूँ
ये किसी को बताना या समझाना न पड़े

ये थोड़ी मासूम सी चाहत है
इसलिए मैं इसे रखने के लिए
वो दिल तलाश रहा हूँ
जो न भरा हो और ना खाली ही हो
हो सके तो
वापसी की उम्मीद के बिना
फ़िलहाल
सच्ची शुभकमनाएं दीजिए मुझे.

© डॉ. अजित


Friday, August 11, 2017

स्वप्न

 दृश्य एक:

नींद में नदी मुझे जगाती है
स्वप्न में पहाड़ मुझे बुलाते है
बुखार में समंदर मुझे समझाता है
हंसते हुए रास्ता मुझे टोकता है
रोते हुए झरना मुझे देखता है
मंदिर मेरी योजनाओं का साक्षी बनता है
सीढ़ियों पर मेरे सपने हाँफते पड़े रहते है
मेरी जिद खरपतवार  के यहाँ
चाय की पत्ती उधार मांगने चला गई है

और मुझे अज्ञात दृश्यों की हाजिरी के लिए नियुक्त किया गया है
मैं देखता हूँ और गिनती भूल जाता हूँ
मेरे स्मृतियों में कुछ चेहरे है
जो आपस में कतई में नही मिलते है
इसलिए
मेरी याद अब संदिग्ध हो गई है.

दृश्य दो:
स्पर्शो की प्रतिलिपि
कहीं रख कर भूल गया हूँ
फिलहाल उनकी गवाही की सख्त जरूरत है
यदि ये स्पर्श नही मिलें
मेरी सजा  तय हो जाएगी
मैं सजा से नही
बल्कि
अपनी स्मृतियों के चूक जाने से घबरा रहा हूँ
तुम्हारे स्पर्शों के बिना
निर्वासन भी कहाँ आसान होगा?

दृश्य तीन:
ईश्वर से पूछता हूँ
तुम्हारी आँखें नही थकती
हस्तक्षेप शून्य दुनिया को देखते हुए
अच्छा होता थोड़ी देर सो लेते तुम
ईश्वर मेरी बिन मांगी सलाह पर रो पड़ता है
फिर मुझे याद आता है
खुद का मनुष्य होना और मैं भी रोने लगता हूँ
फिर पुन:
मैं देखने लगता हूँ आसमान की तरफ
और ईश्वर देखने लगता है धरती की तरफ.

©डॉ. अजित  


Friday, August 4, 2017

वियोग की कविताएँ

वियोग की कविताएँ
--
ब्रेक अप की ध्वनि
थोड़ी चलताऊ किस्म की थी
इसलिए मैंने कहा इसे वियोग
ब्रेक संभवानाशून्य था
जबकि वियोग में थी
संजोग की थोड़ी संभावनाएं
भाषा के स्तर पर
लड़ता रहा मैं खुद से
एक सांत्वना भरी लड़ाई
बाद में जिसे समझा गया
मेरा डिफेन्स मैकेनिज्म.
**
तुम्हारी अनुपस्थिति में
मेरी वाणी पर व्यंग्य आकर बैठ गया
मैं देखता था हर जगह मतलब
मैं सूंघता था हर जगह षड्यंत्र
तुम्हारे बिना
एक औसत मनुष्य भी नही रहा मैं
इसलिए तुम्हारा साथ
याद आता रहा लोगो को
एक आदर्श की तरह.
**
इन दिनों अकेला
धरती पर लगाता हूँ कान
आसमान मेरे दूसरे के कान के जरिए
हो जाता है धरती के अंदर दाखिल
इस दौरान वो छोड़ जाता है
मेरे दिमाग में कुछ अफवाहें
मैं खड़ा हो जाता हूँ तुंरत
मैं आसमान को तब तक
वापसी का रास्ता नही दूंगा
जब तक वो
इनके गलत होने की
खुद नही करेगा
आकाशवाणी
**
दूर कहीं एक पक्षी गा रहा है
विरह का कोई गीत
उसकी तान में एक उदासी है
मैं गुनगुना चाहता हूँ
ठीक ऐसा ही कोई गीत
मेरे पास उदासी तो  है
मगर कोई गीत नही है
इसलिए मैं देखता हूँ
हसंते हुए लोगो को
और हो जाता हूँ उदास
**
तुम्हारे बाद
मेरा चीजो से तादात्म्य टूट गया है
स्मृतियाँ हो गई है आगे-पीछे
अभी किसी ने पूछा मुझसे
क्या ये रास्ता जाता है बस स्टैंड?
मैंने कहा
जरुर, मगर तभी यदि आप जा पाएं
उसके बाद उसने कोई सवाल नही किया
इस तरह अनायास ही
घोषित हुआ मैं
एक गलत रास्ता बताने वाला.
© डॉ. अजित


Thursday, August 3, 2017

दीपा के नाम

दीपा के नाम
__
दीपा मेरे साथ तीसरी कक्षा में पढ़ती थी
हम पांचवी तक साथ पढ़ें
उसके बाद दीपा कितनी पढ़ी
मुझे याद नही
मैं जरुर एमए पीएच.डी कर गया

दीपा से मेरी दोस्ती नही थी
तब लड़के और लड़की दोस्त नही होते थे
हम सहपाठी थे

मेरे पास रेनोल्ड्स का एक पेन था
जो मैंने अपने एक दूर के चाचा की जेब से चुराया था
दीपा को वो पेन पसंद था
मगर चूंकि मुझे भी वो उतना ही पसंद था
इसलिए कभी मुझसे मांग नही पाई

वो बचपन में एक दूसरे की पसंद का
ख्याल रखने का दौर था
इसे आप मित्रता का एक लक्षण समझ सकते है

दीपा को मुझसे ज्यादा पहाडे याद थे
मेरी अंग्रेजी दीपा से ठीक थी
एकदिन मैंने दीपा से पूछा तेरह का पहाड़ा
उसके जवाब में दीपा ने मुझे पूछी फ्रेंड की स्पेलिंग
हम दोने के जवाब में थी कुछ गलतियां
मगर हम संतुष्ट थे

बीस साल  से ज्यादा वक्त हो गया
दीपा मुझे नही दिखी
मेरी तरह वो भी अब होगी बाल बच्चोदार

कभी कभी याद आती है दीपा
क्यों आती है नही मालूम
दीपा को भी याद आता होगा 
अपना स्कूल का बचपन
यह नही मालूम
मगर दीपा नही भूली होगी

वो रेनोल्ड का पेन
वो उसको याद आता होगा किसी दिन सपने में
डराता होगा उसे भेष बदल बदल कर

मैं ये बात इतने विश्वास से इसलिए कह सकता हूँ
पिछले कुछ दिनों से
दीपा मुझे डरा रही है सपनों में
भेष बदल-बदल कर

वो हंसती है अब मेरी अंग्रेजी पर
और सुनाती है पैंतीस का पहाड़ा
इतने जोर से कि
मैं उठ जाता हूँ सोता हुआ.
©डॉ. अजित


Tuesday, August 1, 2017

सफ़र की कविताएँ

सफ़र की कविताएँ
__
मेरे पास एक बैग है
उसमे दो जोड़ी कपड़े है
बैग मेरे कंधे पर है
मगर मैं सपनो की मजदूरी करने निकला हूँ
इसलिए मेरे पैर ज़मीन के अन्दर धंसे है
आसमान यह देख मुस्कुराता है
और मुझे याद आता है अपना मनुष्य होना.
**
मेरे पास कुछ पते है
उन पतों  का सही होना थोड़ा संदिग्ध है
मेरे पास कुछ पते है
मेरे पास इस बात से उपजा एक हौसला है
मैं उन पतों पर शायद ही कभी जाऊँगा
मुझे अपना हौसला हर हाल में बचाना है.
**
बस का कंडक्टर पूछता है मुझसे
कहाँ जाना है?
मैं तत्परता से इसका जवाब देने से चूक जाता हूँ
जब वो थोड़ा आगे बढ़ जाता है
फिर मैं एक शहर का नाम बताता हूँ
वो देखता है मुझे लगभग वैसे
जैसे बिन टिकिट कहीं जाना चाहता हूँ मैं
सफ़र में तत्परता से चूकने पर
मनुष्य और गति
कभी नही करती माफ.
**
जहां मैं कल था
वहां अब मैं कब आउंगा
नही बता पता मुझे
जहां मैं आज हूँ
वहां पहले कभी नही आया मैं
जहां मैं कल जाऊँगा
वहां कभी दुबारा नही जाना चाहता मैं
मेरे मन में जितने भी नकार है
वही मेरी यात्राओं का सच और भविष्य है.
**
सफ़र में भूख लगती है
तो याद आता है चना चबैना
प्यास लगती है तो
याद आती है खाली फेंकी गई
कोल्ड ड्रिंक की बोतल
सफर के दौरान
कुछ यादें आती है सिलसिलेवार
फिर नही याद आती
भूख और प्यास.
**

© डॉ. अजित 

Saturday, July 29, 2017

अस्पताल की कविताएँ- 2

अस्पताल की कविताएँ- 2
**
नित्य और अनित्य के मध्य
डॉक्टर का संतुलित मत
कभी भरोसा जगाता था
तो कभी डराता था
उन दिनों मैं हो गया था बेहद कन्फ्यूज्ड
किसे माना जाए भगवान
कभी डॉक्टर लगा था भगवान
तो कभी भगवान लगता था एक डॉक्टर.
**
कभी कभी जूनियर डॉक्टर
सीनियर डॉक्टर से तुम्हारी बीमारी के बारें में
करते थे  सवाल-जवाब
उस वक्त रूम बन जाता क्लास रूम
तुम्हें ‘सब्जेक्ट’ बनता देख लगता था बेहद खराब
तब डॉक्टर से नही करता था कोई सवाल
बस देखता था तुम्हारी तरफ
उस वक़्त तुम ही थी
जिसके पास था मेरे हर सवाल का जवाब.
**
डॉक्टर के लिए
तुम एक बीमार देह थी
यह उनकी पेशेवर प्रशिक्षण का हिस्सा था
फिर भी
मैंने कई बार डॉक्टर को देखा
थोड़ा निजी तौर पर  चिंतित होते हुए
जब तुम ठीक हो गई
डॉक्टर ने अपनी खुशी छिपाई हमसें
तब जान पाया मैं
एक डॉक्टर की परिपक्वता.
***
नर्सिंग स्टेशन का स्टाफ
मेरी अधीरता के कारण
मुझे करता था
थोड़ा नापसंद
महज़ तुम्हारे कारण
वो मुस्कुराते हुए आता था पेश
मैंने डिस्चार्ज के वक्त
जब उनको कहा धन्यवाद
उन्होंने कहा ‘ख्याल रखना’
तुम्हारे प्यारा होने का यह सबसे बड़ा सबूत था
मेर लिए.
**
कुछ दवाओं के नाम
मुझे याद रहा गए है
मैं उन्हें भूलना चाहता हूँ
जब कोई करता है
बीमारी की बात
मेरे याददाश्त हो जाती है ताज़ा
फिर जानबूझकर
बीमारी की बात पर
सुना देता हूँ मैं अपनी एक कविता
दवा को भूलने की
यही एक दवा है मेरे पास.

© डॉ. अजित 

Friday, July 28, 2017

अस्पताल की कविताएँ

अस्पताल की कविताएँ
****

तुम्हारे दाएं हाथ में कैनूला लगा है
मैं उसकी लम्बी सुईं को देखता हूँ
जिस जगह कैनूला लगा है
आसपास नसें दुबक गई है इसके दबाव से
तमाम तकलीफ के बावजूद
तुम्हारा हाथ खूबसूरत लग रहा है
दर्द में ख़ूबसूरती तलाशना मेरी आदत नही वैसे
यह कैनूला तुम्हारे हाथ पर टंका है
किसी पहाड़ी फूल सा
मैंने जब तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लिया
इसने किया कुछ इस तरह से ऐतराज़
जैसे इसे मुझसे ज्याद फ़िक्र हो तुम्हारी.
**
वातानुकूलित कक्ष
दीवार पर टंगा एलसीडी
और एक साफ सुथरा कमरा है
फिर भी मैं पलटता रहता हूँ रिपोर्ट्स
उकता कर बंद कर देता हूँ टीवी
तुम्हारी आँख लगी है अभी
सोते हुए देखकर लगता नही तुम बीमार हो
तुम बीमार हो ये सोचकर
नींद नही आती मुझे.
**
मेडिकल की भाषा में यह फ्लूड है
गाँव की भाषा में मैं इसे ग्लूकोज़ कहता हूँ
टप-टप ये बहता है आसमान से जमीन की और
और इन दोनों के बीच तुम लेटी हो
बीच-बीच में यह डरा देता है
जैसे कि बंद हो गया हो इस प्रवाह
मैं चाहता हूँ ये बोतल आखिरी हो
मेरे चाहने से कुछ नही होता
यदि कुछ होता तो तुम यहाँ क्यों होती भला
ग्लूकोज़ को मैं कहता हूँ धन्यवाद
तुम्हारी तरफ से
फ्लूड नही देता कोई जवाब.
**
हर घण्टे बाद
तुम्हारा तापमान नापना है मुझे
ये काम वैसे नर्स का था
मगर मैंने उत्साह से नर्स को मना कर दिया 
हर आधें घण्टे में
तुम्हारे माथे पर हाथ फेरता हूँ मैं
ताकि कम हो सके आने वाले गणना
ये कोई दवा नही है
ये दुआ भी नही है
ये बस मेरा अन्धविश्वासी मन है
जिसे नर्स से ज्यादा खुद पर भरोसा है.
**
बीमारी में
जब आधी गाल से तुम मुस्कुराती हो
अच्छी लगती हो
मेरी हर लम्बी आह पर
ये मुस्कान बरबस निकलती है
इस तरह हम दोनों
विदा करते है
अपने भारी भरकम दुःख को.

© डॉ. अजित